Hindi Poem ~ GyaniTota
GyaniTota

कुछ याद उन्हें भी करलो जो लौट के घर न आये | A Poem On Independence Day

अंग्रेजी शासन के क्रूर अत्याचारो,अनैतिक यातनाओं दमनकारी नीतियों से त्रस्त भारतीय जनता में असंतोष का स्वर फूटा। आगे चलकर यही स्वर स्वाधीनता आंदोलन के रूप में परिणित हो गया। इस आन्दोलन में भारत के जन-जन ने हिस्सा लिया। सभी ने भारत माता की जय के उद्धोष के साथ स्वतन्त्र होने का संकल्प लेकर लडाई लडी। इस लडाई में देश के अनेक वीर सपूत शहीद हो गये। एक लम्बे संधर्ष के बाद देश स्वतन्त्र हो गया। पन्द्रह अगस्त 1947 का वह नया सवेरा खुशियाॅ लेकर प्रस्तुत हुआ लेकिन आजादी के लगभग 70 वर्ष बीतने के बाद आज हम उन शहीदों,महापुरूषों को भूलते जा रहे है। उनके संधर्षी जीवन को विस्मृत करने जा रहे है। इसी भाव भूमि पर प्रस्तुत है,यह कविता (independence day poem in hindi)।




independence day poem for 15 august

मातृभूमि के लिये जिन्होने दे दी अपनी जान।
ऐसे वीर बांकुरों को क्यों भूला हिन्दोस्तान।।
                    प्राणों की आहुति देकर जो नया सवेरा लाये।
                  स्वाधीनता समर में जिनने गीत मात के गाये।।

 गोरों से ललकार कहा था भाग दुष्ट व्यापारी।
भारतवर्ष हमारा तुम हो यहाँ कहाँ से आये।।
                    बन्दी मां की लाज बचाना ही थी जिनकी शान।
                    ऐसे वीर बांकुरों को क्यों भूला हिन्दोस्तान।।
  
माथे पर थी रोली जिनके सिर पर कफन बधा था।
जिनके हाथों सदा तिरंगा झण्डा फहर रहा था।।
                    आतातायी गोरों को था जिनने खूब छकाया।
                   जिनकी हुंकारों से सारा लन्दन दहल उठा था।।
 मिटा दिया अपने को लेकिन रखी जिन्दा आन।
 ऐसे वीर बांकुरों को क्यों भूला हिन्दोस्तान।।

                   याद करो झासी वाली रानी के रण कोशल को।
                   याद करो सब पीर अली के हाहाकारी छल को।।
याद गुलाम गौस खाँ की तोपो की करनी होगी।
याद करो झलकारी बाई के बलिदान प्रबल को।।
                   आजादी की दीपशिखा पर दहके शलभ समान।
                   ऐसे वीर बांकुरों को क्यों भूला हिन्दोस्तान।।

मातृभूमि पर हुए निछावर हम उनको नमन करें।
उनके चित्रों पर पुष्पाजंलि देकर स्तवन करें।।
सत्यं शिवम सुन्दरम् के सत्पथ का अनुगमन करें।
 धर में धुसे पीर अलियों जयचन्दों का दमन करें।।
                   बच्चे-बूढें-युवा सभी मिल छेडो नूतन तान।
                   ऐसे वीर बांकुरों को क्यों भूला हिन्दोस्तान।।


About Author: 

महेश पाण्डेय जी का हिंदी के प्रति विशेष प्रेम है, हिंदी कवितायेँ, कहानियां और राजनीति के विषयों पर अपनी प्रतिक्रिया देने में इनकी विशेष रूचि है। इनके लेख दैनिक जागरण में प्रकाशित होते रहते हैं।

क्या है मानव | A Poem On Real Human Life In Hindi

मानव का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है | इस संसार में जन्में हुए हर प्राणी को कठिनाईयों से गुजरना पड़ता है | हमें क्या करना है और कैसे करना है यही हमारे जीवन की परीक्षा है |इस छोटी सी कविता के माध्यम से मैं आप लोगों को यह अवगत कराना चाहती हूँ कि संघर्ष ही जीवन है |

what is a humen



मानव भी क्या मानव है,
खुद ही संभालता अपना जीवन है |
दुखों से भरा उसका यौवन है,
कष्ट झेलता वो मन जौहर है |

संताप नहीं उसके मन में,
चेहरा तम से है भिचा हुआ
जीने की लालसा के भय से
दुनियां से आज अभीप्सित हुआ |

जीवन की मधुशाला में,
अनगिनत कोपल है खिले हुए |
इस सिन्धु की चौपाटी में
धवल दीप हैं सजे हुए
अमोल है पर  लाचार है
पर क्या करें बेसहारा आज कारगुजार है |

आँखे धसीं महिमा गाती
पर ईश्वर का शुक्र अदाकार है |
प्रज्वलित मन वो संतोषी है
नहीं दाना वरन कोशी है
भेंट बांटता औरों को
पर उसका जीवन परितोषी है,
यही अनन्य भक्त ईश्वर का,
फूल कांटे बांटता हुआ,
झुकी कमर बादल बरसाता
दुनियां से आज निष्कासित हुआ |

बेटी की बिदाई | An Emotional Poem | Poem On Vidayi

माँ बेटी को जन्म देती है,पालपोश कर बड़ा करती है लेकिन उसका ममतामयी हृदय काँप जाता है जब वह अपनी बेटी को ससुराल भेजकर खुद से अलग करती है |ये शब्द एक माँ हृदय से निकली हुई आवाज है,जो अपनी बेटी की शादी करने से पहले सोचती है |माँ बेटी के बचपन से लेकर हर एक गुजरे पल को याद कर बिलख-बिलख कर रोती है कि वह कैसे अपनी बेटी को विदा करेगी | अंततः,वह घड़ी भी आ जाती है,पहले तो उसका मन काँप जाता है लेकिन बाद में अपनी अन्तरात्मा की आवाज सुनकर वह अपना दिल हल्का कर लेती है और अपने संस्कारों के बल पर बेटी को दो परिवारों की बागडोर संभालने के लिये प्रोत्साहित करती है |


hindi poem on vidayi of a girl


माँ की ममता के आँचल में,
बेटी ने सहेजे वो दो पल ,
कर सूना उस आँचल को ,
आज वो ससुराल चली |

ममता रोई ,आँचल रोया ,
खेली–पली जिस घर में ,
था उस दिन ,
वो आँगन रोया |

मेहँदी लगी है हाथों में ,
करवा रही, मन में अहसास ,
कल छोड़ तुम्हें सब जाना है ,
माँ-पिता,घर,देहरी और ये द्वार |

माँ के कलेज़े के टुकड़े को ,
कल पराया हो जाना है ,
मन में खटकती यह बात,
इसलिए रहता है मेरा मन उदास |

बेटी पराई होती है ,
आज समझ आया मुझे ,
क्यों कहता है,
सारा ब्रम्हांड |

ढोल-नगाड़े बज रहे ,
ढोलक की थाप गूँज रही ,
शहनाई आँगन में बज रही ,
पर ममता का आँचल कचोट रहा |

कल बेटी चली जाएगी ,
कैसे सहूँ इस दर्द को ,
है दिल मन ही मन रो रहा |

दिल दहलाता यह एहसास ,
आज है जो मेरी आन ,
कल बन जायेगी ,
मेरा छोड़ दूसरे की शान |

चलने को जब होती उद्यत ,
मैं ऐसे ठिठुर जाती ,
जैसे सर्द हवाएं जाड़ो में ,
हाड़-मॉस सब कंपा जाती |

कल बेटी विदा हो जाएगी ,
ये घर आँगन छोड़ जायेगी ,
आँखों से ओझल होता देख ,
ममता ने मुझे झकझोर दिया |

कर दो विदा तुम बेटी को ,
कुछ मान-मर्यादा उसे सिखा देना ,
जाकर तुम अपने उस घर में ,
फूलों के गुल खिला देना |

सास-ससुर हैं माता-पिता ,
देवर ही तुम्हारा भाई है ,
ननद ही तुम्हारी बहना है ,
ऐसा उसको सिखला देना |

करके सम्मान तुम उन सबका ,
खुद अपना मान बढ़ाओगी ,
उनकी बगिया को फलता देख ,
उस दिन से बहू नहीं, बेटी कहलाओगी |

दो परिवारों की बागडोर ,
अच्छे से तुम्हें संभालनी है ,
हमारे संस्कारों की सीख से ,
तुम्हें शान अपनी बढ़ानी है |

ममता की इस आवाज ने ,
मेरे मन को आज तसल्ली दी ,
कर दूँगी बेटी विदा मैं ,
ह्रदय कठोर बना लूंगी |

अपनी छाया से जिसे मैंने ,
पालपोष कर बड़ा किया ,
आँखों में आँसू भरकर के ,
मैंने आज उसे विदा किया |